कितना बदल गया इंसान..
दूरियां घटी चाँद और धरती की बीच ,
और इंसान इंसान से दूर हो गया,
पानी पर चलना और हवा उड़ना सिख लिया ,
धरती पर चलना भूल गया इंसान
कितना बदल गया इंसान,
मंगल पर बसने को है तैयार,
धरती पर कैसे रहना भूल गया इंसान,
आधुनिकता के इस युग मे,
बूंद बूंद पानी के लिए लड़ने लगा इंसान,
कितना बदल गया इंसान,
महफ़िलो की गिनती बड़ी,
रिश्तो को निभाना भुला इंसान,
धन दौलत शान शौकत सब पाया,
आपने घर को भूल गया इंसान,
कितना बदल गया इंसान,
प्रजातांत्रिक देश समाज मे,
प्रेमतंत्र को भुला इंसान,
धर्म के नाम पर मर मिटने लगे,
धर्म जीना सिकाता है ये बात भुला इंसान,
कितना बदल गया इंसान,
ब्रह्मांड के कई राज़ खोले,
मन की गांठ खोलना भुला इंसान,
गर्व अभिमान की जंग मे,
इंसानियत बलि चढ़ा रहा इंसान,
धरती तप रही वन उपवन रो राहे,
बस हँस रहा इंसान बन हैवान,
पशु पक्षी चीख रहे नदी हो रही बेजान,
बेखबर आने वाले कल से,
इंसान मचा रहा हाहाकार,
कितना बदल गया इंसान...
आभार
गौरव मणि खनाल
बहुत ही खूब कही आप ने,,,,,,
ReplyDeleteबहुत बढ़िया, लगे रहो...........
जय हिंद